चिरमिरी में सामुदायिक भवन बना ठेकेदार का ठिकाना।
₹1500 प्रतिदिन किराये वाले भवन को मुफ्त में देने का आरोप, पार्षद पुत्र की भूमिका पर उठे सवाल,

चिरमिरी में सामुदायिक भवन बना ठेकेदार का ठिकाना।
₹1500 प्रतिदिन किराये वाले भवन को मुफ्त में देने का आरोप, पार्षद पुत्र की भूमिका पर उठे सवाल,
एम सी बी /नगर पालिक निगम चिरमिरी का एक सामुदायिक भवन इन दिनों विवादों के केंद्र में है। जिस भवन का उपयोग कभी आम नागरिकों की समस्याओं के समाधान के लिए मुख्यमंत्री वार्ड कार्यालय के रूप में किया जाता था, उसी भवन के कथित निजी उपयोग को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि आम जनता के लिए निर्धारित किराये पर उपलब्ध इस भवन को एक ठेकेदार को बिना किराया लिए इस्तेमाल करने दिया जा रहा है।
मिली जानकारी के अनुसार पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में इस सामुदायिक भवन में मुख्यमंत्री वार्ड कार्यालय संचालित होता था। इसके माध्यम से नागरिकों को नगर निगम से संबंधित कई सुविधाएं और सेवाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होती थीं। लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए नगर निगम कार्यालय के चक्कर नहीं लगाने पड़ते थे। लेकिन वर्तमान में इस भवन के उपयोग को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
₹1500 प्रतिदिन किराया, फिर मुफ्त में उपयोग क्यों?
बताया जा रहा है कि नगर निगम के इस सामुदायिक भवन का किराया आम नागरिकों के लिए 1500 रुपये प्रतिदिन निर्धारित है। इसके बावजूद आरोप है कि वार्ड क्रमांक 33 के पार्षद पुत्र की कथित मेहरबानी से भवन के एक ठेकेदार को निःशुल्क उपयोग के लिए दे दिया गया है। यदि यह आरोप सही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर किसके आदेश पर और किन नियमों के तहत सार्वजनिक संपत्ति का मुफ्त उपयोग करने की अनुमति दी गई है?
पार्षद पुत्र की भूमिका भी चर्चा में:
इस पूरे मामले में वार्ड क्रमांक 33 के पार्षद पुत्र की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं हो रही हैं। आरोप है कि पार्षद पुत्र संबंधित ठेकेदार के कार्यों में मुंशी के तौर पर काम करते नजर आते हैं। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि और संबंधित पक्षों का बयान सामने आना बाकी है।
जनता के लिए बना भवन, निजी उपयोग के लिए कैसे?
सामुदायिक भवन का उद्देश्य आम नागरिकों को सुविधा उपलब्ध कराना और सार्वजनिक जरूरतों को पूरा करना है। ऐसे में यदि किसी सार्वजनिक भवन का उपयोग बिना निर्धारित किराये के निजी कार्यों के लिए किया जा रहा है, तो यह नगर निगम की व्यवस्था और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय स्तर पर अब यह मांग उठ रही है कि नगर निगम प्रशासन पूरे मामले की जांच करे और स्पष्ट करे कि भवन किसकी अनुमति से ठेकेदार को दिया गया है। साथ ही, भवन के आवंटन से संबंधित आदेश, किराया वसूली के नियम और वास्तविक उपयोग की स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर निगम प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाएगा?
सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग में नियमों का पालन सुनिश्चित करना और आम नागरिकों के हितों की रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। फिलहाल, इस मामले में नगर निगम प्रशासन और संबंधित जनप्रतिनिधियों का पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।




