चिरमिरी में ‘कोरिया नीर’ बुझा रहा प्यास, लेकिन कर्मचारियों की जिंदगी में छाया अंधेरा: 48 महीनों से वेतन का इंतजार, सिस्टम की संवेदनहीनता चरम पर

चिरमिरी में ‘कोरिया नीर’ बुझा रहा प्यास, लेकिन कर्मचारियों की जिंदगी में छाया अंधेरा: 48 महीनों से वेतन का इंतजार, सिस्टम की संवेदनहीनता चरम पर

चिरमिरी। नगर पालिक निगम चिरमिरी के अंतर्गत आम जनता को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावों के साथ शुरू किया गया ‘कोरिया नीर’ वाटर एटीएम आज खुद एक बड़ी विडंबना का शिकार हो चुका है। भीषण गर्मी के इस दौर में जहाँ यह वाटर एटीएम क्षेत्र के हजारों लोगों के गले की प्यास बुझाने का एकमात्र सहारा बना हुआ है, वहीं इसे संचालित करने वाले कर्मचारी पिछले चार सालों यानी 48 महीनों से अपने हक के वेतन के लिए तरस रहे हैं। यह स्थिति किसी विडंबना से कम नहीं है कि दूसरों की प्यास बुझाने वाले ये कर्मचारी खुद अपने और अपने परिवार की बुनियादी जरूरतों के लिए दाने-दाने को मोहताज हैं। जिला खनिज संस्थान मद (DMF) के करोड़ों रुपयों से खड़ी की गई यह व्यवस्था अब उन कर्मचारियों के लिए ‘काला पानी’ की सजा जैसी साबित हो रही है, जो महज 4500 रुपये के अल्प मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि जब से कोरिया नीर वाटर एटीएम की शुरुआत हुई है, तभी से इन कर्मचारियों की किस्मत में केवल दर-दर की ठोकरें खाना ही लिखा है। अपने जायज वेतन के लिए इन मजदूरों ने स्थानीय नेताओं से लेकर जनप्रतिनिधियों के दरवाजे तक अनगिनत चक्कर लगाए, उनके सामने गिड़गिड़ाए, लेकिन सत्ता और राजनीति के गलियारों में इनकी आवाज को सुनने वाला कोई नहीं है। महंगाई के इस दौर में जहाँ 4500 रुपये की राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, वहां 48 महीनों का लंबित वेतन यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर ये परिवार जीवित कैसे हैं? क्या प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी केवल उद्घाटन करने और फीता काटने तक सीमित है? इन कर्मचारियों का घर कैसे चल रहा होगा और वे अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च कैसे उठा रहे होंगे, यह शायद आज की संवेदनहीन व्यवस्था के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है।
इस पूरे मामले में नगर पालिक निगम के अधिकारियों का रवैया भी बेहद निराशाजनक और टालमटोल वाला नजर आता है। जब इस गंभीर मुद्दे पर जिम्मेदार अधिकारियों से बात करने की कोशिश की जाती है, तो वे कैमरे और सवालों से बचते नजर आते हैं। दबी जुबान में कुछ अधिकारियों का कहना है कि शुरुआत में डीएमएफ फंड से वेतन का प्रावधान था, जिसे अब जिला प्रशासन ने बंद कर दिया है। अब तर्क यह दिया जा रहा है कि वाटर एटीएम से होने वाली आय से ही कर्मचारियों का वेतन निकाला जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या चिल्लर रुपयों के संग्रह से एक कर्मचारी का मासिक वेतन और 48 महीनों का पिछला बकाया भुगतान संभव है? गर्मियों में भले ही पानी की खपत बढ़ने से आय बढ़ती हो, लेकिन बाकी साल के आठ महीनों में इन कर्मचारियों के भविष्य का क्या होगा?
यह स्थिति सीधे तौर पर सिस्टम की विफलता को दर्शाती है। एक तरफ शासन जनहित की योजनाओं के लिए करोड़ों का बजट आवंटित करता है, लेकिन उन योजनाओं को धरातल पर चलाने वाले “ग्राउंड वर्कर” के पेट पर लात मारी जाती है। क्या डीएमएफ फंड का उद्देश्य केवल निर्जीव मशीनों को खड़ा करना था, या उन इंसानों का सम्मान भी इसमें शामिल था जो इस व्यवस्था को जीवित रखे हुए हैं? आखिर क्यों जिला प्रशासन और नगर निगम के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा इन गरीब कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है? क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है या फिर इन कर्मचारियों की चुप्पी को उनकी कमजोरी मान लिया गया है? चिरमिरी का यह कोरिया नीर प्रोजेक्ट आज अपनी सफलता के नहीं, बल्कि प्रशासन की क्रूरता और अनदेखी के कारण चर्चा में है, जहाँ पानी तो शुद्ध मिल रहा है लेकिन मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी हैं।




