छत्तीसगढ़

चिरमिरी: नगर निगम के 22 साल और प्यासी जनता, क्या सियासी ‘गठबंधन’ बुझा पाएगा हलक की प्यास या यह महज चुनावी बिसात?

चिरमिरी: नगर निगम के 22 साल और प्यासी जनता, क्या सियासी ‘गठबंधन’ बुझा पाएगा हलक की प्यास या यह महज चुनावी बिसात?

चिरमिरी। नगर पालिक निगम चिरमिरी के गठन को दो दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन विडंबना देखिए कि आज भी यहां की जनता बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है। विशेषकर घनी आबादी वाले उन सात वार्डों में स्थिति बदतर है, जो कहने को तो SECL क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं और जहां आमानाला से आजाद नगर तक बाकायदा पाइपलाइन का जाल बिछा हुआ है। SECL के अधिकारी सारा ठीकरा अवैध कनेक्शनों पर फोड़ रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि वर्षों से जमे इन जिम्मेदार अफसरों की नाक के नीचे यह अवैध खेल कैसे फल-फूल रहा है? पिछले कार्यकाल में पार्षदों ने अपनी निधि से पाइपलाइन बिछवाई और तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी 10 करोड़ रुपये की सौगात दी, जिसमें से 2 करोड़ इस क्षेत्र में खर्च भी हुए, फिर भी जनता प्यासी क्यों है? सबसे बड़ा सवालिया निशान तो उस 185 करोड़ की अमृत जल मिशन योजना पर खड़ा होता है, जिसकी प्रक्रिया मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने शुरू कराई है; जब पिछले कार्यकाल में लगभग सभी 40 वार्डों में पाइपलाइन विस्तार का दावा किया जा चुका है, तो फिर आखिर यह भारी-भरकम बजट भविष्य के किस गर्भ में समाने वाला है?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब पानी की एक टंकी से सप्लाई की मांग को लेकर चिरमिरी की राजनीति में ‘अकल्पनीय’ दृश्य देखने को मिला। जो भाजपा और कांग्रेस के नेता शपथ ग्रहण के समय एक-दूसरे का मुंह देखना पसंद नहीं करते थे और अलग-अलग स्थानों पर शपथ ली थी, वे आज एक ही मंच पर कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन करते नजर आ रहे हैं। क्या यह वाकई जनता का दर्द है या फिर पर्दे के पीछे कोई नया सियासी समीकरण बुना जा रहा है? जिस भाजपा की कार्यशैली में इस तरह के उग्र विरोध की परंपरा अपवाद मात्र रही है, उसके कार्यकर्ता कांग्रेसियों के साथ सुर में सुर मिलाते कैसे दिखने लगे? फिलहाल निगम, SECL और प्रशासन के अधिकारियों ने 15 दिन की मोहलत और रोजाना 14 टैंकरों से पानी देने का आश्वासन देकर मामले को शांत तो कर दिया है, लेकिन क्या टैंकरों के भरोसे एक नगर निगम की प्यास बुझ सकती है? धुर विरोधियों का यह ‘अघोषित गठबंधन’ जनता को वाकई उनका हक दिलाएगा या फिर 15 दिन बाद प्यासी जनता खुद को फिर उसी मोड़ पर खड़ा पाएगी, यह देखना अभी बाकी है।

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