छत्तीसगढ़

चिरमिरी का छलकता दर्द: सौ वर्षों तक देश को रोशन करने वाली धरा आज खुद अंधेरे और उपेक्षा के साये में

चिरमिरी का छलकता दर्द: सौ वर्षों तक देश को रोशन करने वाली धरा आज खुद अंधेरे और उपेक्षा के साये में


चिरमिरी। ऊर्जाधानी के रूप में विख्यात चिरमिरी आज अपने अस्तित्व और विकास के लिए आंसू बहा रही है। लगभग एक सदी से देश की अर्थव्यवस्था को गति देने और घरों को रोशन करने के लिए अपनी छाती चीरकर कोयला देने वाली यह धरती आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। ताज्जुब की बात यह है कि जहां एसईसीएल (SECL) अन्य क्षेत्रों में खेल परिसरों और बुनियादी ढांचों के लिए करोड़ों की सौगातें बांट रहा है, वहीं चिरमिरी की झोली आज भी खाली है। हाल ही में सोहागपुर क्षेत्र के बुढ़ार में एक भव्य खेल परिसर के लिए 202.27 लाख रुपये की वित्तीय सहायता की स्वीकृति ने चिरमिरी के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया है, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या कोल प्रबंधन के लिए चिरमिरी केवल दोहन का एक केंद्र बनकर रह गया है।
विगत 100 वर्षों का इतिहास गवाह है कि चिरमिरी ने एक ममतामयी मां की तरह अपना आंचल हमेशा फैलाए रखा ताकि देश का औद्योगिक पहिया थमे नहीं और हजारों परिवारों का चूल्हा जलता रहे। लेकिन इस त्याग के बदले में चिरमिरी को क्या मिला? आज यह शहर चारों तरफ से उजाड़ और बर्बादी की कगार पर खड़ा नजर आता है। गहरी खदानें, उड़ती धूल और जर्जर होती सड़कें यहां की नियति बन चुकी हैं। जिस जमीन ने सोना उगलकर कोल इंडिया और एसईसीएल की तिजोरियां भरीं, उस जमीन के हक में प्रबंधन ने कभी उदारता नहीं दिखाई। विडंबना देखिए कि प्रबंधन की फाइलों में विकास की बड़ी-बड़ी योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन वे चिरमिरी की सरहदों तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती हैं।
इस घोर उपेक्षा के पीछे केवल कोल प्रबंधन की उदासीनता ही नहीं, बल्कि यहां के जन प्रतिनिधियों और श्रमिक नेताओं की मौन चुप्पी भी एक बड़ा कारण नजर आती है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कई दशकों में किसी भी कद्दावर नेता या श्रमिक संगठन ने कोल प्रबंधन के सामने मजबूती से चिरमिरी के हक की लड़ाई नहीं लड़ी। जब पड़ोसी क्षेत्रों में करोड़ों के सीएसआर (CSR) फंड से खेल मैदान, अस्पताल और शिक्षण संस्थान खड़े किए जा रहे हैं, तब चिरमिरी के नेतृत्व ने प्रबंधन से ऐसी कोई ठोस मांग क्यों नहीं रखी? श्रमिक हितों का दम भरने वाले संगठन और विकास के वादे करने वाले प्रतिनिधि आज जनता के सवालों के घेरे में हैं।
चिरमिरी की वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लगता है जैसे इस शहर को उसके हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया गया है। संसाधन सिमट रहे हैं, बाजार अपनी रौनक खो रहे हैं और युवा पलायन करने को मजबूर हैं। यदि समय रहते कोल प्रबंधन ने अपनी ‘दोहन करो और भूल जाओ’ की नीति नहीं बदली और स्थानीय नेतृत्व ने अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं त्यागी, तो आने वाली पीढ़ियां इस बर्बादी का हिसाब जरूर मांगेंगी। चिरमिरी आज भी एक मां की तरह धैर्य रखे हुए है, लेकिन उसकी सहने की क्षमता अब जवाब दे रही है। अब आवश्यकता इस बात की है कि जिस धरा ने देश को ऊर्जा दी, उसे उजाड़ होने से बचाने के लिए प्रबंधन और नेतृत्व दोनों अपनी जिम्मेदारी समझें।

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