तीन विधायक, दो सरकारें और 40 करोड़ की ‘जलावर्धन’ का रहस्य; फिर भी हफ्तों प्यासा रहता है चिरमिरी

चिरमिरी। चिरमिरी की जल समस्या अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरा ‘राजनीतिक चक्रव्यूह’ बन चुकी है। साल 2008 से लेकर आज 2026 तक, तीन अलग-अलग विधायकों ने अपनी पूरी ताकत और करोड़ों का बजट इस शहर की प्यास बुझाने के नाम पर झोंक दिया, लेकिन आज भी हकीकत यह है कि गर्मी आते ही जनता को हफ्तों तक पानी का इंतजार करना पड़ता है।
तीन विधायकों का ‘पानी’ वाला रिपोर्ट कार्ड
शहर की जलापूर्ति व्यवस्था को सुधारने के लिए चली आ रही जलावर्धन योजना का इतिहास किसी सस्पेंस फिल्म से कम नहीं है:
- दीपक पटेल (2008): चिरमिरी के पहले विधायक के रूप में इन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से 34 करोड़ रुपए की जलावर्धन योजना स्वीकृत कराई थी। उम्मीद थी कि यह योजना शहर की तकदीर बदलेगी।
- श्याम बिहारी जायसवाल: अगले कार्यकाल में उन्होंने इसी योजना की महत्ता को देखते हुए बजट में 6 करोड़ की वृद्धि कराई, जिससे यह योजना 40 करोड़ की हो गई।
- डॉ. विनय जायसवाल: उन्होंने इस बहुप्रतीक्षित योजना को तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के हाथों जनता को समर्पित (लोकार्पण) भी करवा दिया।
सवाल यह है: यदि योजना समर्पित हो चुकी है और करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं, तो वह पानी धरातल पर क्यों नहीं दिख रहा?
पहेली: जब पानी रोज आता है, तो जनता को हफ्तों इंतजार क्यों?
जानकारों और पीएचई (PHE) विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी एक अजीबोगरीब विरोधाभास पैदा करती है।
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- एक दिन SECL, एक दिन जनता: बताया जाता है कि वर्तमान पाइपलाइन से एक दिन एसईसीएल (SECL) को पानी दिया जाता है और एक दिन आम जनता के लिए सप्लाई खुलती है।
- गायब होता पानी: गणित कहता है कि यदि सप्लाई रोटेशन में भी है, तो कम से कम हर दूसरे दिन पानी मिलना चाहिए। लेकिन हकीकत में गर्मी आते ही यह अंतराल हफ्तों में बदल जाता है।
- SECL का दोहरा संकट: दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन पानी एसईसीएल की कॉलोनियों के लिए जाता है, वहां भी हाहाकार मचा रहता है। वहां भी नलों से ज्यादा ‘टैंकरों’ का सहारा लेकर पानी बांटा जा रहा है।
बड़ा सवाल: आखिर वह पानी जा कहां रहा है? यदि न एसईसीएल की जनता खुश है और न ही आम नागरिक, तो क्या पाइपलाइन के बीच में ही पानी का कोई बड़ा ‘लीकेज’ या ‘लीडरशिप का फेलियर’ है?
बैठक-बैठक का खेल और टैंकर माफिया का लाभ
हर साल नगर निगम, पीएचई और एसईसीएल के अधिकारी एसी कमरों में ‘बैठक-बैठक’ खेलते हैं। आरोप है कि इन बैठकों का असली उद्देश्य समाधान निकालना नहीं, बल्कि टैक्टरों और टैंकरों के माध्यम से करोड़ों के टेंडर निकालकर भ्रष्टाचार की गंगा बहाना है।
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- अमृत मिशन का अटका टेंडर: 181 करोड़ का अमृत जल मिशन एक साल से टेंडर प्रक्रिया में ही उलझा हुआ है। जानकारों का मानना है कि यदि यह मिशन सफल हो गया, तो सालाना होने वाली टैंकरों की ‘अंधाधुंध कमाई’ बंद हो जाएगी, इसीलिए इसे जानबूझकर लटकाया जा रहा है।
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पार्षदों की चुप्पी और जनता का बढ़ता आक्रोश
वार्डों की जनता अपने पार्षदों पर नजरें गड़ाए बैठी है, लेकिन पार्षद इस पूरे खेल में मूकदर्शक बने हुए हैं। 40 करोड़ की जलावर्धन योजना का ‘लोकार्पण’ होने के बाद भी जनता का प्यासा रहना यह साबित करता है कि करोड़ों रुपए पाइपलाइन में नहीं, बल्कि सिस्टम की फाइलों में बह गए।
निष्कर्ष: 2008 से 2026 के बीच 40 करोड़ की पुरानी योजना और 181 करोड़ की नई ‘अमृत योजना’ के बीच में कहीं चिरमिरी की प्यास दफन हो गई है। यह महज पानी की किल्लत नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा ‘सिस्टम स्कैम’ नजर आता है, जिसकी जांच होनी अनिवार्य है।