नगर निगम की पहली सालगिरह: ‘ईंट-बालू’ के खेल में उलझा निगम, अफसरशाही के साये में विकास ठप

नगर निगम की पहली सालगिरह: ‘ईंट-बालू’ के खेल में उलझा निगम, अफसरशाही के साये में विकास ठप
चिरमिरी | नगर निगम चुनाव के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी चिरमिरी की स्थिति “ऊंची दुकान, फीका पकवान” जैसी बनी हुई है। जिस शहर को विकास की नई ऊंचाइयों पर होना चाहिए था, वह आज जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण पलायन के मुहाने पर खड़ा है।
पिछली विरासतों को किया धूमिल
चिरमिरी नगर पालिक निगम का इतिहास ऐसा कभी नहीं रहा। आज भी लोग प्रथम महापौर स्वर्गीय सुभाषिनी सिंह के कार्यों और उनके विकास के विजन को याद करते हैं। उनके बाद डम्बरू बेहरा का कार्यकाल आया, जिन्हें जनता ‘मोटरसाइकिल वाला महापौर’ कहती थी, जो बेहद सहजता से आम लोगों के बीच उपलब्ध रहते थे। तीसरे कार्यकाल में निर्दलीय महापौर डमरू रेड्डी ने दो बड़े विपक्षी दलों के बीच होने के बावजूद अपना कार्यकाल कुशलतापूर्वक चलाया। वहीं, चौथे कार्यकाल में कंचन जायसवाल ने एक गृहिणी होने के बावजूद निगम में अफसरशाही को हावी नहीं होने दिया। लेकिन वर्तमान कार्यकाल इन गौरवशाली परंपरायें को तोड़ता नजर आ रहा है।
एक इंजीनियर के हाथ में निगम की ‘रिमोट कंट्रोल’
वर्तमान नगर सरकार में अफसरशाही देखने को मिल रहा है। निगम के गलियारों में यह चर्चा आम है कि पूरा निगम केवल एक विशेष इंजीनियर के इशारे पर चल रहा है। शहर में कोई भी काम हो, छोटा हो या बड़ा, आदेश उसी एक इंजीनियर का लेना पड़ता है। जनप्रतिनिधियों की मौन सहमति ने अधिकारियों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि जनहित के काम फाइलों और आदेशों के चक्कर में दम तोड़ रहे हैं।
181 करोड़ के प्रोजेक्ट्स और ‘रिटेंडर’ का मायाजाल
कैबिनेट मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल अपने हर भाषण में 181 करोड़ की अमृत मिशन 2.0 पाइपलाइन, गौरव पथ और बायपास रोड का दावा करते हैं। लेकिन सूत्रों की मानें तो इसी अफसरशाही और तकनीकी कमियों के बहाने हर बार टेंडर निरस्त कर रिटेंडर का खेल खेला जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सब किसी खास ‘सेटिंग’ के लिए किया जा रहा है?
पलायन का दंश और ईंट-गिट्टी की राजनीति
एक ओर शहर पलायन की मार झेल रहा है, जहां पर्यटन और उच्च शिक्षा के अवसरों की सख्त जरूरत है, वहीं निगम प्रशासन केवल ईंट, गिट्टी और बालू के ठेकों में उलझा हुआ है। इसी उदासीनता के कारण 3 करोड़ का मंगल भवन आज भी अधूरा खड़ा है।
भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
लेटर पैड कांड: पार्षदों द्वारा खाली लेटर पैड पर हस्ताक्षर कर ठेकेदारों को देना।
ठेकेदार का ‘समानांतर ऑफिस’: एक रसूखदार ठेकेदार के घर से निगम की फाइलों का संचालन होना।
महापौर की प्राथमिकता: जनता बदहाल सड़कों से त्रस्त है और महापौर अपनी गाड़ी के टेंडर को मैनेज करने में व्यस्त हैं।
निष्कर्ष: चिरमिरी नगर निगम आज नेतृत्व विहीन और अफसरशाही का शिकार नजर आता है। यदि समय रहते एक इंजीनियर के ‘एकछत्र राज’ और कमीशन के खेल को नहीं रोका गया, तो चिरमिरी की जनता इस कार्यकाल को ‘काले अध्याय’ के रूप में याद रखेगी।



