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नगर सरकार के ‘प्रथम नागरिक’ पर उठे सवाल: करोड़ों के रॉयल्टी घोटाले के आरोपियों की पैरवी या क्षेत्र से विश्वासघात?

नगर सरकार के ‘प्रथम नागरिक’ पर उठे सवाल: करोड़ों के रॉयल्टी घोटाले के आरोपियों की पैरवी या क्षेत्र से विश्वासघात?

चिरमिरी। नगर पालिक निगम चिरमिरी में करोड़ों रुपये के कथित रॉयल्टी घोटाले ने अब एक नया राजनीतिक और नैतिक मोड़ ले लिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, क्षेत्र के ‘प्रथम नागरिक’ यानी महापौर, जो पेशे से अधिवक्ता (वकील) हैं, कथित तौर पर इस घोटाले में शामिल आरोपियों का बचाव पक्ष के वकील के रूप में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

​इस खुलासे के बाद शहर के गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं कि क्या एक जनप्रतिनिधि के लिए जनहित से ऊपर अपना निजी पेशा रखना न्यायोचित है?

नैतिकता और पेशे के बीच फंसा पद

​चिरमिरी की जनता ने जिस उम्मीद और अप्रत्याशित जनादेश के साथ महापौर को चुना था, आज वही जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। रॉयल्टी घोटाला सीधे तौर पर नगर निगम के राजस्व की क्षति है, जिसका अर्थ है—जनता के विकास कार्यों के लिए आने वाले फंड की चोरी।

विवाद के मुख्य बिंदु:

  • हितों का टकराव (Conflict of Interest): नगर निगम के प्रमुख होने के नाते महापौर का प्राथमिक कर्तव्य निगम के राजस्व की रक्षा करना है। ऐसे में निगम को नुकसान पहुँचाने वालों का बचाव करना सीधे तौर पर हितों का टकराव है।
  • जनता का विश्वास: चुनाव के समय किए गए विकास के वादों के विपरीत, निगम को आर्थिक चोट पहुँचाने वालों के साथ खड़ा होना जनमत का अपमान माना जा रहा है।
  • विपक्ष के आरोप: विपक्षी पार्षदों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि “जिस व्यक्ति पर क्षेत्र की संपत्ति बचाने की जिम्मेदारी है, वही उसे लूटने वालों का ढाल बन रहा है।”

क्या कहता है न्याय और नैतिकता का तराजू?

​कानूनी रूप से किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद का अधिवक्ता चुनने का अधिकार है और अधिवक्ता को अपना पेशा करने का। लेकिन जब अधिवक्ता एक सार्वजनिक पद (महापौर) पर आसीन हो, तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी कानूनी अधिकारों से ऊपर हो जाती है।

​”जब राजस्व की चोरी होती है, तो नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे शहर की सड़कों, नालियों और रोशनी की व्यवस्था का होता है। ऐसे में शहर के मुखिया का रुख संदिग्ध होना चिंताजनक है।” — स्थानीय नागरिक

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