चिरमिरी का ‘खोखला’ विकास – जहाँ सड़कों पर गड्ढे हैं, भविष्य धुएँ में और व्यवस्था ‘लाइव’ फोटो में मस्त है!

चिरमिरी का ‘खोखला’ विकास – जहाँ सड़कों पर गड्ढे हैं, भविष्य धुएँ में और व्यवस्था ‘लाइव’ फोटो में मस्त है!
सरगुजिया टाइम्स, चिरमिरी
कोयलांचल की वह धरती जो कभी अपनी संपन्नता के लिए पूरे प्रदेश में मिसाल थी, आज ‘सिस्टम की उपेक्षा’ का एक जीवंत स्मारक बन चुकी है। चिरमिरी का प्रशासन और यहाँ के जनप्रतिनिधि शायद किसी ऐसी ‘जादुई दुनिया’ में रहते हैं जहाँ कागजों पर तो करोड़ों के टेंडर तैर रहे हैं, लेकिन धरातल पर आम जनता की कमर उबड़-खाबड़ सड़कों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में टूट रही है।
1. विधान चौधरी: व्यवस्था के मुँह पर एक जलता हुआ तमाचा
जब सरकारी सिस्टम लकवाग्रस्त हो जाए, तो जनता को खुद सड़क पर उतरना पड़ता है। इसका जीता-जागता उदाहरण हैं रिटायर्ड कर्मी विधान चौधरी। अपने पुराने स्कूटर पर मौरम और गिट्टी लादकर, सड़कों के जानलेवा गड्ढों को अपने निजी खर्च और पसीने से भरते हुए विधान जी अक्सर दिख जाते हैं।
विगत दिनों कई समाचार चैनलों ने उनके इस कार्य को दिखाया, लेकिन ‘धन्य हैं यहाँ के जनप्रतिनिधि!’ जिन्हें न तो इस बुजुर्ग की मेहनत देख शर्म आती है और न ही इस बात का अहसास होता है कि जो काम नगर निगम और PWD को करना चाहिए, वह एक रिटायर्ड व्यक्ति अपनी पेंशन के पैसों से कर रहा है।
2. ‘फोटो वाली सरकार’ और सोशल मीडिया का मायाजाल
हाल ही में बदहाल सड़कों को लेकर ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष शिवांश राजू जैन ने तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा और आंदोलन की चेतावनी दी। इस दबाव में आकर क्षेत्र की ‘शहर सरकार’ ने आनन-फानन में जेसीबी मशीनें तो उतारीं, लेकिन वह ‘जनसेवा’ से ज्यादा ‘कंटेंट क्रिएशन’ नजर आया।
नेताओं ने सोशल मीडिया पर ‘लाइव’ आकर काम शुरू होने का ढिंढोरा तो पीटा, लेकिन जनता का आरोप है कि ‘लाइव’ खत्म होते ही काम भी ठप हो गया। आज जनता इस प्रशासन को ‘फोटो वाली सरकार’ के नाम से पुकार रही है, जहाँ विकास केवल कैमरे की फ्लैश लाइट तक सीमित है।
3. ‘रेफर’ अस्पताल और पलायन की मजबूरी
चिरमिरी का स्वास्थ्य ढांचा खुद ‘वेंटिलेटर’ पर है। अस्पतालों की बिल्डिंगें तो चमक रही हैं, लेकिन अंदर न आधुनिक मशीनें हैं और न पर्याप्त विशेषज्ञ। छोटी सी इमरजेंसी होते ही मरीजों को बिलासपुर या रायपुर के लिए ‘रेफर’ कर दिया जाता है।
यही कारण है कि खदानों में जीवन खपाने वाला कर्मी रिटायर होते ही यहाँ रुकना नहीं चाहता। उड़ीसा, बंगाल, सरगुजा और बिलासपुर की ओर बढ़ते उनके कदम चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यहाँ स्थायित्व के लिए कोई काम नहीं हुआ। नेताओं के लिए ‘टेंडर’ ही अंतिम सत्य है, इंसानी जज्बात नहीं।
4. युवा: बेरोजगारी का ज़हर और नशे का साया
सबसे भयावह मंजर चिरमिरी के युवाओं का है। रोजगार के अवसर पैदा करने में नाकाम यह सिस्टम अब युवाओं को शराब और गांजे की गर्त में धकेलता देख मूकदर्शक बना है। जब हाथ में काम नहीं होता, तो दिमाग में अवसाद घर करता है। आज चिरमिरी का भविष्य सड़कों के किनारे नशे की हालत में लेटा हुआ मिलता है, जबकि जनप्रतिनिधि अगले चुनाव के समीकरण बिठाने में व्यस्त हैं।
निष्कर्ष: कागजी शेर और खोखले वादे
चिरमिरी से केवल कोयला निकाला गया, बदले में उसे मिली धूल, धुआं और खोखले आश्वासन। शासन का पैसा नाली और चबूतरे बनाने के नाम पर ऐसे बहाया जा रहा है जैसे खदानों का गंदा पानी, लेकिन गुणवत्ता और विजन का नामोनिशान नहीं है।
सवाल यह है कि जब शहर पूरी तरह ‘खाली’ हो जाएगा, तब ये चमचमाती फोटो और कागजी सड़कें किसके काम आएंगी?




